रामनाम की महिमा: मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

“राम” शब्द की शीतलता, मर्यादा और उत्साहवर्धन से लेकर राम नाम को कल्पतरु, कलि-कल्याण निवासु तथा पूर्ण ब्रह्म सीताराम के रूप में मानने तक—राम नाम जप की महिमा और उसके अर्थ का भावपूर्ण वर्णन।

गीता का सार: जीवन का आधार—कविता

इस स्वरचित कविता में “गीता का सार ही है जीवन का आधार” को केंद्र में रखते हुए भक्ति, कर्तव्य-मार्ग, कर्मण्यता, फलाकांक्षा का त्याग और दृढ़ विश्वास जैसे संदेश प्रस्तुत किए गए हैं।

स्वतंत्रता और खुशियों की बिदाई (2020-2021) – जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी

“सन् 2020–2021” के संदर्भ में लिखी गई यह कविता स्वागत, बिदाई, दर्द-आंसू और फिर स्वतंत्रता, प्रेम व सद्भाव के बीज बोने की प्रेरणा देती है। कैद-सी स्थिति से बाहर निकलकर उम्मीदों को संजोने का संदेश इसमें है।

होली का उपहार: रजनी की याद और रंगों से बना मिलन

दिनेश और सुनीता के बीच दूरियाँ, यादें और नाराज़गी होली के रंगों में घुल जाती हैं। छुट्टी के दिन की प्रतीक्षा से शुरू होकर घर लौटने तक की भावनात्मक कहानी—“होली का उपहार”।

अकेला बचपन: मोबाइल के गुम होने और समय की सीख की कहानी

“अकेला बचपन” में वैभव के दादा-दादी के साथ बिताए पलों, मोबाइल के गुम होने के रहस्य और अकेलेपन की वजह से की गई गलत हरकत से मिलने वाली सीख को कहानी के रूप में बताया गया है।

एक और सावित्री: किडनी दान की करुण कथा

रश्मि के पति रोहन की किडनियां खराब हो जाती हैं और तत्काल ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। परिवार की चिंता के बीच रश्मि का दृढ़ निश्चय उसे अपनी एक किडनी पति को देने तक ले जाता है—और आखिरकार दोनों जीवन की उम्मीद के साथ आगे बढ़ते हैं।

पाखंड पर करारा कटाक्ष: बिना गुरु कैसे पाएगा हरि?

यह कविता सही-गलत की उलझनों, ग्रंथ पढ़ने की बजाय सच्ची भक्ति, मंदिर-मस्जिद की दिखावटी आस्था और दीन-हीन की उपेक्षा जैसे पाखंडों पर सवाल उठाती है। इसमें गुरु के बिना प्रभु-प्राप्ति और प्रतिमा-पूजा के दिखावे पर भी तीखा संदेश है।

प्रेम की पराकाष्ठा: बालू और रेवती की मार्मिक प्रेमकहानी

बालू और रेवती का बचपन साथ-साथ, फिर हालातों के कारण बिछड़ना, पैसा जुटाने का संघर्ष, और अंततः एक स्कूल में एडमिशन दिलाने के जरिये उनके प्रेम और कृतज्ञता की भावपूर्ण परिणति—“प्रेम की पराकाष्ठा”।

प्रलय सूक्ति: महाभय और प्रलय का काव्य

“प्रलय सूक्ति” में संसार के भयावह अंत, देवताओं के मिटने और मनुष्यों की चिताओं के उठने, धरा के नष्ट होने तथा भय, क्षुब्धता और अंधविश्वास के फैलाव का काव्यात्मक चित्रण है।

शादी का निमंत्रण: कोरोना के दौर की बहस

शादी के निमंत्रण पर शर्मा जी और विनिता की टकराव भरी बातचीत, महामारी के समय शादी में जाने से इनकार, और अंत में आती कोरोना से जुड़ी चौंकाने वाली खबर—यह सब एक पारिवारिक बहस के रूप में सामने आता है।